Ekadashi : पापों को नष्ट करने वाली पापमोचनी एकादशी
भीमं वनं भवति यस्य पुरं प्रधानं सर्वो जनः स्वजनतामुपयाति तस्य । कृत्स्ना च भूर्भवति सन्निधिरत्नपूर्णा यस्यास्ति पूर्वसुकृतं विपुलं नरस्य ।।

Ekadashi : जिस मनुष्य के द्वारा पूर्व जन्मों में अत्यधिक पुण्य किये हुए होते हैं, उसके लिए भयंकर जंगल भी श्रेष्ठ नगर हो जाता है, सभी मनुष्य उसके अपने बन्धु-बान्धव हो जाते हैं और सम्पूर्ण पृथ्वी उसके लिए श्रेष्ठ निधियों और रत्नों से परिपूर्ण हो जाती है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर प्रत्येक मनुष्य को वर्तमान में श्रेष्ठ कर्म करते रहना चाहिये।
भगवान की कृपा को प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए उनकी कथाएँ, उनका नाम एक प्रकाश स्तंभ की तरह होते हैं, जिसकी छत्रछाया में हमें प्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष बोध होता रहता है। आज हम लोग एकादशी की पुनीत पावन कथा में संदर्भ में जी कथा का स्मरण करने जा रहे हैं वह चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी है।
एक बार राजा मांधाता ने लोमश ऋषि से एक प्रश्न किया कि गलती से हुए पापों से मुक्ति कैसे प्राप्त की जा सकती है। तब ऋषि ने उन्हें पापमोचनी एकादशी व्रत के बारे में बताया।
प्रचलित कथाओं के अनुसार, एक बार च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी वन में तपस्या कर रहे थे। तभी वहाँ से एक अप्सरा जा रही थी। जिसका नाम मंजुघोषा था। उसकी नजर मेधावी पर पड़ी और वह उसे देखकर मोहित हो गई। इसके बाद मंजुघोषा ने मेधावी को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए कई प्रयास किए। इस काम की मदद के लिए कामदेव भी आ सामने आ गए। तब मेधावी भी मंजुघोषा की तरफ आकर्षित हो गए। ऐसे में वह देवों के देव महादेव की तपस्या की करना भूल गए। कुछ समय निकल जाने के बाद मेधावी को अपनी गलती का एहसास हुआ, तो उन्होंने मंजुघोषा को दोषी मानते हुए उन्हें पिशाचिनी होने का श्राप दिया, जिससे अप्सरा अधिक दुखी हुई। इसके बाद अप्सरा ने मेधावी से माफी मांगी और इस बात को सुनकर मेधावी ने मंजुघोषा को चैत्र माह की पापमोचनी एकादशी व्रत के बारे में बताया।
मेधावी के कहने पर मंजुघोषा ने विधिपूर्वक पापमोचनी एकादशी का व्रत किया। व्रत के शुभ प्रभाव से अप्सरा को सभी पापों से छुटकारा मिल गया। इस एकादशी व्रत के प्रभाव से मंजुघोषा दोबारा से अप्सरा बन गई और स्वर्ग में वापस चली गई। मंजुघोषा के बाद मेधावी ने भी पापमोचनी एकादशी व्रत का पालन किया, जिससे उनके सभी पाप नष्ट हो गए। यह एकादशी सभी पापों को नष्ट करने वाली मानी जाती है। व्रत करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और व्यक्ति की आत्मिक उन्नति होती है।
